"कुशवाहा लोकपाल बिल"
मित्रों ! उत्थान
या सुधार के लिये चाहे किसी भी क्षेत्र में कार्य किया जाये, लेकिन उस कार्य को करते वक़्त अत्यंत कठनाई भी
महसूस हो सकती है अथवा आसानी के साथ-साथ प्रसन्नता भी महसूस हो सकती है|यदि कोई कार्यकर्ता, पदाधिकारी या संगठन की कार्यप्रणाली, लक्ष्य व लक्ष्य के प्रति समर्पण, कथनी- करनी में समानता तथा व्यक्तित्व विकास पर
जोर जैसे बिन्दुओं में श्रेष्ठता - पारदर्शिता रखकर
कार्य करे या किया जाये, तो सफलता कदम चूमती
नजर आएगी अन्यथा एक शतक पुरानी महासभा का परिणाम भी सामने है| जो काम एक दशक में हो सकता है वह एक शतक बीत जाने पर भी नही होगा, क्योंकि कारण-निवारण ढूंढने वाले पदाधिकारी चाहिये , समाज के दर्द को अपना दर्द समझने वाले
कार्यकर्ता चाहिये, तोड़ने वाले नहीं जोड़ने वाले शक्तिमान चाहिये| यदि अधिकांश पदाधिकारियों का एकमात्र लक्ष्य, एकमात्र चिंतन सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक पथ पाना
है और उस पर चलकर किसी राजनीतिक संगठन में बंधुआ मजदूर की कुर्सी प्राप्त कर लेना है, तो सीधे राजनीतिक विंग बनाकर वे उसमें काम क्यों नही कर सकते? क्यों महासभा रूपी सागर से निकलने वाले अमृत को
निकलने नही देना चाहते?क्यों राजनीतिक क्षेत्र के अलावा हर क्षेत्र के दरवाजे
बंद करने के अघोषित प्रयास किये जाते हैं? क्या समाज में प्रतिभाएं सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में ही हैं?क्या समाज में राजनीतिक क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्र प्रतिभा व चेतना शून्य हैं? बहुत सारे विचारणीय प्रश्न हैं| आज सबसे अधिक विचारणीय एवं शीघ्र परिवर्तन करने
योग्य जो एक बिंदू है, वह यह है कि महासभा के पदों में प्रत्यक्षत:
राजनीतिक दलों
के पदाधिकारी कृपा करके अध्यक्ष , महामंत्री
व कोषाध्यक्ष तो ना ही बनें| इस हेतु संविधान में परिवर्तन किया
जाये| अ.भा.
सैनी, मौर्य, शाक्य, कुशवाहा जैसी सैकड़ों
नामधारी जातियां
तथा उपजातियां जो इस महासभा को मानती हैं , उनकी तरफ से इसे एक सूत्रीय अखिल
भारतीय कुशवाहा समाज का " कुशवाहा लोकपाल बिल " समझा जाये और स्वीकार
किया जाये| तत्काल
प्रदेशों में "new
working committee" के गठन के पूर्व इसे लागूw किया
जाये|लागू
ना करने पर आने वाली समस्याओं
की जिम्मेदारी महासभा के पदाधिकारियों
पर होगी| इसे
हल्के में ना लिया जाये|
इन राजनीतिक लोगों में हर तरह की सामर्थ्य है| इस सामर्थ्य में दिन-दूना तथा रात-चौगुना
वृद्धि होगी, यदि ये अधिकांश राजनितिक लोग दिलो-दिमाग बृहत
करके महासभा के अथवा अन्य समान संगठन के संरक्षक या सलाहकार आदि जैसे पद ग्रहण कर
लें|इन संगठनों में पूरी उर्जा के साथ लगकर युवाओं
को (चाहे उनके रिश्तेदार हों या गैर रिश्तेदार) उर्जावान बनाने में मदद करें| यदि ये अधिकांश राजनितिक शख्सियत ऐसा करने में
कुतर्कों के आधार पर आनाकानी करते हैं तो समाज के युवाओं को आगे आने में देर नहीं
करनी चाहिए और समाजहित में , महासभा के हित में, जिस हद तक भी जाना पड़े, चलने के लिए अब तैयार हो जाना चाहिए| महासभा के सौ साल पूरे होने का क्या मतलब, जब समाजहित में एक परिवर्तन महासभा के संविधान
में ना किया जा सके? समाज के करोड़ों योग्य तथा गैर राजनीतिक भाइयों-बहनों को आगे लाने का कदम न उठाया जा
सके?बल्कि अपनी सामंतशाही के बल पर पदों को प्राप्त
किया जाता रहे| पूर्व माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष मोतीलाल
शास्त्री के समय से यह एक सूत्रीय मांग
महासभा के संविधान में परिवर्तन हेतु हो रही है| समानता दल के पद ग्रहण के बाद मोतीलाल शास्त्री
ने समाज की राय स्वीकार कर, महासभा का पद छोड़ दिया था| इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष, जिसके राष्ट्रीय महामंत्री नारायण सिंह कुशवाहा
थे| इन
लोगों का चयन झाँसी में "झाँसी युद्ध" के बाद कैसे कैसे हुआ था, सर्वविदित है| तत्कालीन राष्टीय अध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा
से कई बार इस मुद्दे पर वाद-विवाद हुआ, लेकिन उनका कुतर्क था कि मांग करने वालों
को पुरे देश के लोगों को बुलाकर वोटिंग करवाना चाहिए आदि| आखिरकार जो काम मिनटों में आम राय से
संभव था और आज भी है उसे क्यों लटकाया जा रहा है?
साहित्यिक एवं
सांस्कृतिक समिति "सकर्म", अ.भा. कु.महासभा/सामाजिक संगठनों के उन सभी
पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं-शुभचिंतकों आदि को एक बार फिर हार्दिक नमन करती है, जो उपर्युक्त एक सूत्रीय मुद्दे पर सार्थक-
सकारात्मक सोच ही नहीं रखते परन्तु कार्यान्वित करने को तैयार हैं|
"एक सूत्रीय मांग"
राजनीतिक पदों पर बैठे समाज के माननीय व्यक्ति अ.भा.कु.महासभा के अध्यक्ष/
महासचिव/कोषाध्यक्ष के पदों पर पदाधिकारी किसी भी कीमत पर नहीं बनें|इस हेतु महासभा के संविधान में संसोधन किया जाये|
धन्यवाद !
द्वारा,
साहित्यिक एवं
सांस्कृतिक समिति "सकर्म"
भारत
9927580210
9412913170
सादर,
राष्ट्रीय अध्यक्ष/ राष्ट्रीय महामंत्री
अ.भा.कु.महासभा
भारत